Wednesday, August 19, 2009

इतिहास के आइने में मुंगेर का किला

मुंगेर में मिट रहा है मीर कासिम का इतिहास
जिस कर्ण और मीर कासिम के चलते मुंगेर इतिहास का धनी माना जाता है, आज उसका वजूद खतरे में है. इसे संजोने के प्रति किसी का ध्यान नहीं गया. मुंगेर के सांसद रहे डीपी यादव, जयप्रकाश नारायण यादव, ब्रह्मानंद मंडल आदि आए और चले गए. कुछ की तो भारत सरकार में बड़ी भूमिका भी रही. हमारे विधायक मोनाजिर हसन मंत्री भी है और नए सांसद अनंत सिंह जीत कर दिल्ली पहुंचे हैं. देखिए वो क्या करते हैं, लेकिन
इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि पुरातत्व विभाग के जरिये मीर कासिम के सुरंग का राज लोगों के सामने उजागर करने पर किसी का ध्यान नहीं गया. ये सुरंग कष्टहरणी घाट के सामने पार्क में मौजूद हैं. ये सुरंग इतिहास का ऐसा पन्ना है जिनकी जानकारी बहुत कम लोगों को है. वो यदि पुरातत्व विभाग से इस ऐतिहासिक सुरंग की खुदाई करायी गयी होती, तो शायद यह सुरंग अबूझ पहेली नहीं होती. सुरंग कितना लंबा है और यह कहा निकला है, इसका पता नहीं है. सुरंग के निकट ही मीरकासिम के दो बच्चों की कब्र उनकी वीरता की कहानी कहा रहा है. लेकिन मुंगेर को लोग इन कहानियों को नहीं जानते हैं. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि अंग्रेजों के भय से मीर कासिम ने इसी सुरंग से भाग कर अपनी जान बचायी थी. अंग्रेजी फौज ने उनके बेटे गुल व बेटी पनाग को घेर लिया. बताया जाता है दोनों बच्चे आत्मसमपर्ण करने के बजाय हाथ में तलवार ले अंग्रेजों से युद्ध करने निकल पड़े और शहीद हो गये. दोनों की कब्र आज भी यहां मौजूद है. मुंगेर में गंगा तट पर कष्टहरणी घाट पर स्थित इस सुरंग के बारे में लोग यह भी बताते हैं कि यह सुरंग गंगा नदी के नीचे से खोदी गयी है और भागलपुर में जाकर निकली है, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है. सुरंग के द्वार पर मजबूत दीवार है, जो इस बात की गवाही कर रही है कि समूचे सुरंग को ईट के दीवार पर रोका गया है.
सुरंग की बात जो है, वह तो है ही मीर कासिम के ऐतिहासिक किला की दीवारें भी ध्वस्त होने लगी हैं. इतिहास के प्रति मुंगेर के अधिकारियों और नेताओं को इतनी जागरूकता नहीं है कि वो किले का द्वार जहां से कभी राजा महाराजा गुजरा करते थे वहां आज खैनी की दुकानें लगी हैं. फर्जी और नकली दवाई बेचने वालों का शोरुम बन चुका है. किले की दीवार पर सटे पोस्टर्स शहर के प्रति हमारी भावना प्रदर्शित करते हैं. ऐतिहासिक धरोहर पर मार्निंग शो को पोस्टर्स लगे रहते हैं. जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासन तक के लोग इसे आते-जाते देखते हैं, लेकिन किसी ने टूटे दीवार के जीणोद्धार के लिए कोई प्रयास नहीं किया. वर्ष 1934 में आये भूकंप में मीरकासिम का किला ढह गया था, लेकिन उस समय के लोग अपने इतिहास को बचाने के प्रति इतने जागरुक थे कि चंदा इकट्ठा कर जैसा हो सका वैसा किला बना दिया. उस वक्त हम गुलाम थे, हम गरीब थे इसलिए जो नया किला बना वो पुराने किले की झलक मात्र भी नहीं है. उम्मीद तो ये करनी चाहिए कि हमारे किसी नेता ये कहें कि किले को फिर से उसी तरह से बनाया जाएगा जिस तरह का वो 1934 के भुकंप से पहले का था. लेकिन अफसोस, इसके ठीक विपरीत किला के ध्वस्त हुए दीवार की मरम्मत कराने पर कोई ध्यान नहीं दे रहा. पिछले कुछ दशकों में जहां दो केंद्रीय मंत्रियों ने अपना इतिहास सजोने का प्रयास नहीं किया, वहीं तीन बार सांसद रहे ब्रह्मानंद मंडल ने भी इस दिशा में कोई पहल नहीं किया. मुंगेर की जनता उन्हें उनका स्थान दिखाती है तो वो गलत नहीं करती. आज के इंटरनेट युग की कहानी ये है कि मैंने इतिहास में झांकने की कोशिश की तो ऐसी तस्वीर मिली जिससे मेरा दिमाग हिल गया. मुझे दो सौ साल पहले की पेंटिग मिली. मीर कासिम के किले की पेंटिंग. इसे किसी अंग्रेज ने पेंट किया था. ये पेंटिंग 1840 के आसपास की है. मैने उसे पेंट करने की कोशिश की है. शायद आपलोगों को पसंद आए. इन पेंटिंग को देखकर लगता है कि उस जमाने में हमारा मुंगेर कितना शानदार हुआ करता था. मुंगेर का किला देख कर सीना फूल जाता है कि यह किसी जमाने में दिल्ली के लाल किला से भी शानदार हुआ करता था. सोझी घाट से नौलखा बिल्डिंग का नजारा भी देखने लायक है. इस नौलखे बिल्डिंग में आज एनसीसी का आफिस और सेंट जेवियर स्कूल चल रहा है. बताया जाता है कि यहां मीरकासिम का मंत्री रहा करता था.
अब तो बस यही उम्मीद है कि मुंगेर के लोग ही कुछ ऐसा करें कि पुरानी रौनक वापस मिल जाए.

1 comment:

  1. it was an ausm article..i really liked and loved ur work...i really want to do something for my home town munger..we people with similar thoughts and ideas should unite together and should form a society which will encourage other mungerians to think in d same manner..its never late

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